ज्ञानकोष

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तितली की नई प्रजाति

Updated on: Fri, 17 May 2013 11:24 AM (IST)
A new species of butterfly
तितली की नई प्रजाति
तितलियों के रंगबिरंगे संसार में नए मेहमान का आगमन हुआ है। तितली प्रजाति का यह नया मेहमान देखने में अपने कुनबे के अन्य सदस्यों जैसा ही है, मगर शारीरिक अध्ययन में पता चला कि दुनियाभर में पहले इसे कभी नहीं देखा गया। इस तितली को खोजने का श्रेय जाता है देहरादून स्थित भारतीय प्राणी विान सर्वेक्षण को। तितली का नाम 'यापथिमा राजोई' रखा गया है, यह नाम पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलोजी डिपाटर्मंट के पूर्व प्रमुख डॉ. एचएस रोजू के नाम पर रखा गया। अब विश्व में तितली प्रजातियों की संख्या 17 हजार 281 हो गई है। नई प्रजाति की खोज करने वाले जेडएसआइ के वैानिक डा. नरेंद्र शर्मा के मुताबिक एक ताजा सर्वेक्षण में यापथिमा राजोई की खोज उलर प्रदेश के पीलीभीत स्थित दुधवा नेशनल पार्क के तराई क्षेत्र में की गई। इस प्रजाति की तितली विश्वभर में कहीं पर भी रिपोर्ट नहीं की गई है। तितली के शारीरिक अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि हो चुकी है। जेडएसआइ के जर्नल में भी नई खोज को जगह दी गई है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यापथिमा बड़े क्षेत्र में विचरण करने वाली तितली है। जिससे यह परागण (फूलों को निषेचित कर फल व अन्न उपजाने की प्राकृतिक प्रक्त्रिया) में भी अधिक सक्त्रिय भागीदारी निभाएगी। अच्छी बात यह कि यह तितलिया पार्क क्षेत्र में बड़ी संख्या में हैं, लिहाजा इनके अस्तित्व को लेकर फिलहाल कोई खतरा भी नहीं। यह भी पता लगाया जाएगा कि यापथिमा राजोई किसी दूसरे क्षेत्र में भी पाई जाती है या नहीं।
विश्व में तितली प्रजातियों की संख्या 17280 से बढ़कर 17281 हो गई है।
भारत में तितलियों की 1643 प्रजातिया हैं। विश्व के मुकाबले यह संख्या 9.5 फीसद है।

2045 तक इंसान और रोबोट का मेल

Updated on: Thu, 04 Apr 2013 01:07 PM (IST)
By 2045 a combination of human and robot
2045 तक इंसान और रोबोट का मेल
वाशिगटन। एक रूसी अरबपति ने इंसानों को टरमिनेटर स्टाइल का सायबोर्ग अगले तीन दशक में बनाने की योजना का ऐलान किया है। इस लिहाज से वर्ष 2045 तक कभी न मरने वाला ऐसा महामानव बनेगा जिसका कुछ हिस्सा मानव शरीर और कुछ हिस्सा रोबोटिक मशीन होगा।
वेबसाइट डिजिटल ट्रेंड्स के अनुसार 32 वर्षीय अरबपति दिमित्रि इस्तकोव इस योजना को वर्ष 2011 से शुरू कर चुके हैं और इसके मूर्तरूप लेने में वर्ष 2045 का समय लगेगा। उनका अनूठा लक्ष्य एक व्यक्ति के मन और चेतना को एक जीवित मस्तिष्क से एक मशीन में स्थानातरित करना है। इस प्रक्त्रिया में इंसान का व्यक्तित्व और स्मृति भी जस की तस जाएगी। इसतरह सायबोर्ग का कोई शारीरिक स्वरूप नहीं होगा और इंसान का ये सूक्ष्म शरीर इंटरनेट की ही तरह एक नेटवर्क के रूप में अस्तित्व में रहेगा। ये सायबोर्ग प्रकाश की गति से पूरी धरती पर विचरण कर सकेगा। यहा तक कि वह अंतरिक्ष में भी यात्रा कर लेगा।
इस महत्वाकाक्षी योजना का पहला चरण वर्ष 2020 तक पूरा होना है। इसे अवतार-ए का नाम दिया गया है। इसके तहत एक व्यक्ति अपने रोबोटिक इंसानी स्वरूप का खुद नियंत्रण कर सकेगा। वह ऐसा एक ब्रेन मशीन इंटरफेस से करेगा। बताया जाता है कि यह तकनीक तैयार की जा चुकी है।
इस कार्यक्त्रम का दूसरा चरण अवतार-बी है जिसे वर्ष 2025 तक पूरा किया जाना है। इसमें मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके दिमाग का ट्रासप्लाट एक मशीनी शरीर में करना शामिल है। इसके बाद आएगा तीसरा चरण अवतार-सी जिसे 2035 तक पूरा किया जाना है। इसमें मशीन में इंसानी दिमाग का ट्रासप्लाट होगा लेकिन व्यक्ति के समूचे व्यक्तित्व के साथ होगा। 2045 तक एक व्यक्ति अपने मानसिक स्वरूप में दुनिया में बिना किसी माध्यम के विचरण कर सकेगा।
इस्तकोव ने इस अभियान के लिए कई वैज्ञानिकों की नियुक्ति की है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को एक खत लिखकर इस नव मानवता के प्रोजेक्ट को समर्थन देने की अपील की है।

पृथ्वी को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर सकते हैं भूकंप

Updated on: Wed, 01 May 2013 02:22 PM (IST)
Can quakes cause permanent damage to Earth?
पृथ्वी को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर सकते हैं भूकंप
न्यूयार्क। चिली जैसे छोटे देश को लाखों सालों से तबाह करता आ रहे भूकंप पर किए अध्ययन से ये साफ हो गया है कि अत्यधिक तीव्र भूकंप के झटके पृथ्वी को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर देते हैं।
इससे पूर्व के शोधों में हमेशा यही पाया गया कि भूकंप आने के बाद पृथ्वी पर हुई तबाही की भरपाई धरती खुद-ब-खुद ही कालातर में कर लेती है। विश्व में सतह पर हुई तबाही और दरारें भर जाती हैं। हालाकि इस प्रक्त्रिया में कुछ महीने से लेकर कई दशक तक लग जाते हैं।
वेबसाइट ऑवर अमेजिंग प्लानेट के अनुसार 1906 में अमेरिकी शहर सैन फ्रासिस्को में आए भीषण भूकंप में 80 फीसद शहर तबाह हो गया था। अब इस भरपाई के दस्तावेजी सबूत ग्लोबल पोजिशनिंग प्रणाली की मदद से तैयार हो चुके हैं। पृथ्वी की हलचल से हुई तबाही और उसके अमिट निशानों के सबूत अब सबके सामने लाए जाएंगे।
हालाकि कोरेनल यूनिवर्सिटी के भूगर्भ शास्त्री रिचर्ड अल्मेंडिंगर के अनुसार नए शोध में उन भूकंपों का अध्ययन किया गया जिनकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर सात या उससे अधिक की थी। आठ से दस लाख सालों में चिली में आए दो से नौ हजार भूकंपों से आई तबाही के निशान पृथ्वी पर स्थाई थे।

भूकंप को एक दिन पहले भाप लेती हैं चीटिया

Updated on: Mon, 15 Apr 2013 02:38 PM (IST)
Ants able to sense quake before it hits
भूकंप को एक दिन पहले भाप लेती हैं चीटिया
न्यूयॉर्क। अभी तक भूकंप की भविष्यवाणी करना असंभव है लेकिन नन्हीं सी चींटी को इसका आभास हो जाता है और वह भी भूकंप आने के एक दिन पहले।
शोधकर्ताओं की मानें तो चीटियों को एक दिन पहले ही भूकंप आने का अहसास हो जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि रेडवुड चीटिया भूकंप के दौरान पड़ी दरारों में अपनी बस्तिया बसाती हैं। अध्ययन में उन्होंने देखा कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटियों के व्यवहार में काफी बदलाव आ जाता है और भूकंप के एक दिन बाद वे पहले की तरह सामान्य हो जाती हैं।
लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक चीटियों की इस विशेषता को जानने के लिए जर्मनी स्थित यूनिवर्सिटी डिसबर्ग एसेन के गैब्रियल बरबेरिक ने चीटियों के 15 हजार से भी ज्यादा टीलों का अध्ययन किया। बरबेरिक और उनके सहयोगियों ने करीब तीन साल तक वीडियो कैमरे की मदद से चीटियों पर नजर बनाए रखी और एक विशेष सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से उनकी गतिविधियों का अध्ययन किया गया।
शोधकर्ताओं का कहना है भूकंप की तीव्रता दो से अधिक होने पर ही चीटिया अपना व्यवहार बदलती हैं। बरबेरिक कहते हैं कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटिया रातभर अपने टीले के बाहर जागती रहती हैं जबकि आम दिनों में वह दिनभर काम करने के बाद रात को सो जाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि चीटियों को उस दौरान जमीन से उठने वाली गैसों और हलचलों से भूकंप का अंदाजा हो जाता है। इस अध्ययन को विएना में वार्षिक कार्यक्त्रम यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन में भी पेश किया जा चुका है।

विज्ञान ने माना नहीं सूखेगी नर्मदा!

Updated on: Wed, 15 May 2013 02:32 PM (IST)
what scientists said about narmada river
विज्ञान ने माना नहीं सूखेगी नर्मदा!
जबलपुर। अभी तक तो धार्मिक ग्रंथों में ही नर्मदा के महत्व का वर्णन सुनने मिलता था लेकिन अब विज्ञान ने भी मान लिया है, कि नर्मदा नदी का जल लाखों सालों तक नहीं सूखने वाला। जबलपुर से लेकर होशंगाबाद के बीच विन्ध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला से तैयार रिफ्ट वैली ने जमीन के गहराई में सैक़़डों किमी तक नर्मदा जल का भण्डार समेट रखा है। यह भण्डार ही नर्मदा नदी में पानी के प्रवाह को कायम किए हुए है। यह खुलासा स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे में किया गया है।
सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक जबलपुर से लेकर गोटेगांव होते हुए होशंगाबाद तक रिफ्ट वैली फैली हुई है। रिफ्ट वैली का मतलब है कि विन्ध्य और सतपु़़डा पहा़़ड की टेक्टॉनिक प्लेट से बनने वाली गहरी खाई है। इस खाई के भीतर में एलुवियम मिट्टी में नर्मदा जल का भण्डार है। भू--जलविदों के मुताबिक नर्मदा ही एक ऐसी नदी है जिसके प्रवाह मार्ग में सबसे ज्यादा रिफ्ट वैली है। जिसके कारण नदी में पानी का बहाव हमेशा बना रहेगा।
इन इलाकों में पानी ज्यादा
जबलपुर के आगे से लेकर होशंगाबाद तक जमीन के नीचे गहराई में 2 हजार वर्ग किमी इलाके में नर्मदा जल का भण्डार है। नरसिंहपुर जिले का कुल क्षेत्रफल 5 हजार 133 वर्ग किमी है। इतने ब़़डे इलाके की गहराई में 70 फीसद एलुवियम मिट्टी ने करो़़डों मिनियन क्यूब नर्मदा जल को समेट रखा है। जिले के खैरी, मोथेगांव, वासनदेही और तिंदनी के सर्वे में यह बात सामने आई है कि इन जगहों के नीचे 120 मीटर की गहराई में नर्मदा का जल है। वहीं झिरिया, नवगांव वाले बेल्ट में 220 मीटर गहराई तक पानी जमा है। होशंगाबाद जिले के नीचे 20 लाख 18 हजार 882 हेक्टयर मीटर पानी मौजूद है। जिले के नीचे 200 मीटर से ज्यादा गहराई तक नर्मदा जल देखने मिला है।
पानी का दुरपयोग रोकना होगा
नर्मदा के उद्गम अमरकटंक से लेकर प्रदेश के आखिर छोर तक जाने वाले नदी के किनारे बसे 52 ब़़डे छोटे शहरों को लाखों सालों तक पानी मिलता रहेगा। लेकिन शहरीकरण और ब़़ढती आबादी नदी और भूमिगत पानी का उपयोग भी ज्यादा करने लगी है। नरसिंहपुर जिला भूमिगत जल का 93.87 प्रतिशत हिस्सा खर्च कर रहा है। यह खतरे की घंटी माना जा चुका है। प्रदेश के चार ब्लॉक नरसिंहपुर, सतना का अमरपाटन, सोहावल और शाजापुर के अगर में पानी की स्थिति गंभीर बनी हुई है। इसी तरह प्रदेश के 61 ऐसे ब्लॉक हैं जहां बहुत गंभीर स्थिति नहीं है। वहीं सबसे ज्यादा उपभोग करने वाले 24 ब्लॉक बने हुए हैं।
वर्सन
असीमित भंडार
जबलपुर के बाद से लेकर होशंगाबाद तक रिफ्ट वैली है। इसी वैली में नर्मदा जल का असीमित भण्डार क्षेत्र है। हर साल बारिश और नदी प्रवाह का पानी भूमिगत जल के भण्डार को भरता है। इसी वजह से यहां कभी पानी की कमी नहीं होगी। बावजूद इसके पानी का सदुपयोग भी करना होगा।

मार्च में हुआ था चाद पर सबसे बड़ा विस्फोट

Updated on: Tue, 21 May 2013 11:36 AM (IST)
The largest explosion took place in March on the moon
मार्च में हुआ था चाद पर सबसे बड़ा विस्फोट
वाशिटगन। नासा ने कहा है कि गत 17 मार्च को चाद की सतह से कोई बाहरी पदार्थ टकराया था। इससे उसकी सतह पर अब तक का सबसे बड़ा विस्फोट होते देखा गया था। उसे धरती से बगैर दूरबीन के भी देखा जा सकता था। नासा के मेटियोरॉयड इनवायरन्मेंट कार्यालय के बिल कुक ने कहा कि एक छोटा शिलाखंड टकराया था। विस्फोट के बाद जो चमक पैदा हुई अब तक हम लोगों ने जो चमक देखी थी उससे दस गुना अधिक थी। कोई भी व्यक्ति तब चाद को देखता तो उस विस्फोट का असर देख सकता था। उसके लिए किसी दूरबीन की जरूरत नहीं थी। जहा वह टक्कर हुई थी वहा करीब एक सेकंड तक तो किसी तारे से चार गुना चमक थी। नासा के अनुसार, मार्शल स्पेस फ्लाइंग सेंटर के एक विश्लेषक रॉन सग्स कहते हैं कि उन्होंने सबसे पहले एक डिजिटल वीडियो रिकार्ड करते उसके असर की ओर ध्यान दिया। वह इतना चमकीला था कि लगा कि वह उछल कर उनके ऊपर आ गिरा। वह करीब 88 किलो का था और उसकी चौड़ाई 30 से 40 सेंटीमीटर थी। वह 90 हजार 123 किलोमीटर प्रतिघटे की रफ्तार से टकराया था। इसकी वजह से पाच टन टीएनटी विस्फोटक के बराबर विस्फोट था। चंद्रमा पर उल्कापात का नासा पिछले आठ सालों से अध्ययन कर रहा है। ये अब तक का सबसे विशाल उल्कापिंड था जिसकी चमक पृथ्वी तक भी देखी गई। पिछले आठ सालों में चंद्रमा पर 300 दफा उल्कापात हो चुके हैं। लेकिन ये धमाका पिछले धमाकों से दस गुना अधिक था।

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