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2045 तक इंसान और रोबोट का मेल
Updated on: Thu, 04 Apr 2013 01:07 PM (IST)
वाशिगटन। एक रूसी अरबपति ने इंसानों को टरमिनेटर स्टाइल का सायबोर्ग अगले तीन दशक में बनाने की योजना का ऐलान किया है। इस लिहाज से वर्ष 2045 तक कभी न मरने वाला ऐसा महामानव बनेगा जिसका कुछ हिस्सा मानव शरीर और कुछ हिस्सा रोबोटिक मशीन होगा।
वेबसाइट डिजिटल ट्रेंड्स के अनुसार 32 वर्षीय अरबपति दिमित्रि इस्तकोव इस योजना को वर्ष 2011 से शुरू कर चुके हैं और इसके मूर्तरूप लेने में वर्ष 2045 का समय लगेगा। उनका अनूठा लक्ष्य एक व्यक्ति के मन और चेतना को एक जीवित मस्तिष्क से एक मशीन में स्थानातरित करना है। इस प्रक्त्रिया में इंसान का व्यक्तित्व और स्मृति भी जस की तस जाएगी। इसतरह सायबोर्ग का कोई शारीरिक स्वरूप नहीं होगा और इंसान का ये सूक्ष्म शरीर इंटरनेट की ही तरह एक नेटवर्क के रूप में अस्तित्व में रहेगा। ये सायबोर्ग प्रकाश की गति से पूरी धरती पर विचरण कर सकेगा। यहा तक कि वह अंतरिक्ष में भी यात्रा कर लेगा।
इस महत्वाकाक्षी योजना का पहला चरण वर्ष 2020 तक पूरा होना है। इसे अवतार-ए का नाम दिया गया है। इसके तहत एक व्यक्ति अपने रोबोटिक इंसानी स्वरूप का खुद नियंत्रण कर सकेगा। वह ऐसा एक ब्रेन मशीन इंटरफेस से करेगा। बताया जाता है कि यह तकनीक तैयार की जा चुकी है।
इस कार्यक्त्रम का दूसरा चरण अवतार-बी है जिसे वर्ष 2025 तक पूरा किया जाना है। इसमें मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके दिमाग का ट्रासप्लाट एक मशीनी शरीर में करना शामिल है। इसके बाद आएगा तीसरा चरण अवतार-सी जिसे 2035 तक पूरा किया जाना है। इसमें मशीन में इंसानी दिमाग का ट्रासप्लाट होगा लेकिन व्यक्ति के समूचे व्यक्तित्व के साथ होगा। 2045 तक एक व्यक्ति अपने मानसिक स्वरूप में दुनिया में बिना किसी माध्यम के विचरण कर सकेगा।
इस्तकोव ने इस अभियान के लिए कई वैज्ञानिकों की नियुक्ति की है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को एक खत लिखकर इस नव मानवता के प्रोजेक्ट को समर्थन देने की अपील की है।
वाशिगटन। एक रूसी अरबपति ने इंसानों को टरमिनेटर स्टाइल का सायबोर्ग अगले तीन दशक में बनाने की योजना का ऐलान किया है। इस लिहाज से वर्ष 2045 तक कभी न मरने वाला ऐसा महामानव बनेगा जिसका कुछ हिस्सा मानव शरीर और कुछ हिस्सा रोबोटिक मशीन होगा।
वेबसाइट डिजिटल ट्रेंड्स के अनुसार 32 वर्षीय अरबपति दिमित्रि इस्तकोव इस योजना को वर्ष 2011 से शुरू कर चुके हैं और इसके मूर्तरूप लेने में वर्ष 2045 का समय लगेगा। उनका अनूठा लक्ष्य एक व्यक्ति के मन और चेतना को एक जीवित मस्तिष्क से एक मशीन में स्थानातरित करना है। इस प्रक्त्रिया में इंसान का व्यक्तित्व और स्मृति भी जस की तस जाएगी। इसतरह सायबोर्ग का कोई शारीरिक स्वरूप नहीं होगा और इंसान का ये सूक्ष्म शरीर इंटरनेट की ही तरह एक नेटवर्क के रूप में अस्तित्व में रहेगा। ये सायबोर्ग प्रकाश की गति से पूरी धरती पर विचरण कर सकेगा। यहा तक कि वह अंतरिक्ष में भी यात्रा कर लेगा।
इस महत्वाकाक्षी योजना का पहला चरण वर्ष 2020 तक पूरा होना है। इसे अवतार-ए का नाम दिया गया है। इसके तहत एक व्यक्ति अपने रोबोटिक इंसानी स्वरूप का खुद नियंत्रण कर सकेगा। वह ऐसा एक ब्रेन मशीन इंटरफेस से करेगा। बताया जाता है कि यह तकनीक तैयार की जा चुकी है।
इस कार्यक्त्रम का दूसरा चरण अवतार-बी है जिसे वर्ष 2025 तक पूरा किया जाना है। इसमें मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके दिमाग का ट्रासप्लाट एक मशीनी शरीर में करना शामिल है। इसके बाद आएगा तीसरा चरण अवतार-सी जिसे 2035 तक पूरा किया जाना है। इसमें मशीन में इंसानी दिमाग का ट्रासप्लाट होगा लेकिन व्यक्ति के समूचे व्यक्तित्व के साथ होगा। 2045 तक एक व्यक्ति अपने मानसिक स्वरूप में दुनिया में बिना किसी माध्यम के विचरण कर सकेगा।
इस्तकोव ने इस अभियान के लिए कई वैज्ञानिकों की नियुक्ति की है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को एक खत लिखकर इस नव मानवता के प्रोजेक्ट को समर्थन देने की अपील की है।
भूकंप को एक दिन पहले भाप लेती हैं चीटिया
Updated on: Mon, 15 Apr 2013 02:38 PM (IST)
न्यूयॉर्क। अभी तक भूकंप की भविष्यवाणी करना असंभव है लेकिन नन्हीं सी चींटी को इसका आभास हो जाता है और वह भी भूकंप आने के एक दिन पहले।
शोधकर्ताओं की मानें तो चीटियों को एक दिन पहले ही भूकंप आने का अहसास हो जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि रेडवुड चीटिया भूकंप के दौरान पड़ी दरारों में अपनी बस्तिया बसाती हैं। अध्ययन में उन्होंने देखा कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटियों के व्यवहार में काफी बदलाव आ जाता है और भूकंप के एक दिन बाद वे पहले की तरह सामान्य हो जाती हैं।
लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक चीटियों की इस विशेषता को जानने के लिए जर्मनी स्थित यूनिवर्सिटी डिसबर्ग एसेन के गैब्रियल बरबेरिक ने चीटियों के 15 हजार से भी ज्यादा टीलों का अध्ययन किया। बरबेरिक और उनके सहयोगियों ने करीब तीन साल तक वीडियो कैमरे की मदद से चीटियों पर नजर बनाए रखी और एक विशेष सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से उनकी गतिविधियों का अध्ययन किया गया।
शोधकर्ताओं का कहना है भूकंप की तीव्रता दो से अधिक होने पर ही चीटिया अपना व्यवहार बदलती हैं। बरबेरिक कहते हैं कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटिया रातभर अपने टीले के बाहर जागती रहती हैं जबकि आम दिनों में वह दिनभर काम करने के बाद रात को सो जाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि चीटियों को उस दौरान जमीन से उठने वाली गैसों और हलचलों से भूकंप का अंदाजा हो जाता है। इस अध्ययन को विएना में वार्षिक कार्यक्त्रम यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन में भी पेश किया जा चुका
न्यूयॉर्क। अभी तक भूकंप की भविष्यवाणी करना असंभव है लेकिन नन्हीं सी चींटी को इसका आभास हो जाता है और वह भी भूकंप आने के एक दिन पहले।
शोधकर्ताओं की मानें तो चीटियों को एक दिन पहले ही भूकंप आने का अहसास हो जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि रेडवुड चीटिया भूकंप के दौरान पड़ी दरारों में अपनी बस्तिया बसाती हैं। अध्ययन में उन्होंने देखा कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटियों के व्यवहार में काफी बदलाव आ जाता है और भूकंप के एक दिन बाद वे पहले की तरह सामान्य हो जाती हैं।
लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक चीटियों की इस विशेषता को जानने के लिए जर्मनी स्थित यूनिवर्सिटी डिसबर्ग एसेन के गैब्रियल बरबेरिक ने चीटियों के 15 हजार से भी ज्यादा टीलों का अध्ययन किया। बरबेरिक और उनके सहयोगियों ने करीब तीन साल तक वीडियो कैमरे की मदद से चीटियों पर नजर बनाए रखी और एक विशेष सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से उनकी गतिविधियों का अध्ययन किया गया।
शोधकर्ताओं का कहना है भूकंप की तीव्रता दो से अधिक होने पर ही चीटिया अपना व्यवहार बदलती हैं। बरबेरिक कहते हैं कि भूकंप आने से एक दिन पहले चीटिया रातभर अपने टीले के बाहर जागती रहती हैं जबकि आम दिनों में वह दिनभर काम करने के बाद रात को सो जाती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि चीटियों को उस दौरान जमीन से उठने वाली गैसों और हलचलों से भूकंप का अंदाजा हो जाता है। इस अध्ययन को विएना में वार्षिक कार्यक्त्रम यूरोपियन जियोसाइंसेज यूनियन में भी पेश किया जा चुका
अंटार्कटिक में दस गुना तेजी से पिघल रही बर्फ
Updated on: Wed, 17 Apr 2013 12:25 PM (IST)
लंदन। अंटार्कटिक में अब से 600 साल पहले के मुकाबले अब गर्मियों के मौसम में दस गुना अधिक रफ्तार से बर्फ पिघल रही है। बीसवीं सदी की मध्य से अंटार्कटिक ने अपने बर्फ का बड़ा हिस्सा खोना शुरू कर दिया है। एक ताजा अध्ययन में चेताया गया है कि अब गर्मियों के मौसम में बर्फ पिघलने की प्रक्त्रिया इतनी अधिक और घातक हो गई है कि वह अंटार्कटिक की बर्फ की परत और ग्लेशियरों के अस्तित्व को ही प्रभावित करने लगी है। हर एक हजार साल में अंटार्कटिक प्रायद्वीप के मौसम के पुनर्निर्माण पर पत्रिका नेचर जीयोसाइंस के अनुसार गर्मियों में दस परतों तक की बर्फ पिघलने लगी है।
वर्ष 2008 में ब्रिटेन-फ्रेंच साइंस टीम ने जेम्स रास द्वीप के मुख्य स्थान पर 364 मीटर की गहराई तक बर्फ काट करके ये जानने की कोशिश की थी कि अंटार्कटिक प्रायद्वीप के उलरी क्षेत्र में बर्फ की हालत और तापमान कैसा है। उन्होंने पाया कि आइस कोर में की गई खुदाई से बर्फ के भविष्य का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। आइस कोर पर दिखने वाली परतें बताती हैं कि कितनी गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद सर्दियों में वापस जम गई। इन पिघली हुई परतों की मोटाई नापकर बर्फ के पिघलने की रफ्तार का खाका तैयार हो जाता है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने पिछले एक हजार साल की परतों की नाप और तबके तापमान का तुलनात्मक अध्ययन किया है। इसी हिसाब से भविष्य के हालात का भी अनुमान निकाला गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो खामियाजा पूरी धरती को भुगतना होगा।
लंदन। अंटार्कटिक में अब से 600 साल पहले के मुकाबले अब गर्मियों के मौसम में दस गुना अधिक रफ्तार से बर्फ पिघल रही है। बीसवीं सदी की मध्य से अंटार्कटिक ने अपने बर्फ का बड़ा हिस्सा खोना शुरू कर दिया है। एक ताजा अध्ययन में चेताया गया है कि अब गर्मियों के मौसम में बर्फ पिघलने की प्रक्त्रिया इतनी अधिक और घातक हो गई है कि वह अंटार्कटिक की बर्फ की परत और ग्लेशियरों के अस्तित्व को ही प्रभावित करने लगी है। हर एक हजार साल में अंटार्कटिक प्रायद्वीप के मौसम के पुनर्निर्माण पर पत्रिका नेचर जीयोसाइंस के अनुसार गर्मियों में दस परतों तक की बर्फ पिघलने लगी है।
वर्ष 2008 में ब्रिटेन-फ्रेंच साइंस टीम ने जेम्स रास द्वीप के मुख्य स्थान पर 364 मीटर की गहराई तक बर्फ काट करके ये जानने की कोशिश की थी कि अंटार्कटिक प्रायद्वीप के उलरी क्षेत्र में बर्फ की हालत और तापमान कैसा है। उन्होंने पाया कि आइस कोर में की गई खुदाई से बर्फ के भविष्य का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। आइस कोर पर दिखने वाली परतें बताती हैं कि कितनी गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद सर्दियों में वापस जम गई। इन पिघली हुई परतों की मोटाई नापकर बर्फ के पिघलने की रफ्तार का खाका तैयार हो जाता है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने पिछले एक हजार साल की परतों की नाप और तबके तापमान का तुलनात्मक अध्ययन किया है। इसी हिसाब से भविष्य के हालात का भी अनुमान निकाला गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो खामियाजा पूरी धरती को भुगतना होगा।
पानी से नहीं, धूल से बने मंगल पर टीले
Updated on: Wed, 08 May 2013 12:36 PM (IST)
वाशिगटन। वैज्ञानिक अब तक मानते रहे हैं कि मंगल ग्रह पर मौजूद 5.6 किलोमीटर ऊंचे टीले का निर्माण झील की गाद से हुआ है। लेकिन एक नए विश्लेषण के मुताबिक ऐसा संभव है कि इस टीले कार्र् निर्माण लाल ग्रह के धूल धूसरित वातावरण के कारण हुआ हो। इससे इस ग्रह पर जीवन की संभावना तलाशने के प्रयास को झटका लग सकता है। यदि इस शोध के परिणाम सही साबित हुए तो टीले में जल के विशाल भंडार होने की उम्मीदों को भी झटका लगेगा। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं का कहना है कि हवा द्वारा धूल और रेत को ढोकर 154 किलोमीटर चौड़े क्त्रेटर में लाने से 'माउंट शार्प' नाम के इस टीले का निर्माण हुआ है। यह उस प्रचलित सिद्धात के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि माउंट शार्प का निर्माण झील में जमा गाद से हुआ है। इसका यह मतलब हो सकता है कि मंगल पर पूर्व में पृथ्वी जैसी जलवायु होने के बारे में अधिकाश वैानिक जितनी उम्मीद करते हैं, उससे कम ही प्रमाण मौजूद हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का रोवर क्यूरियोसिटी पिछले वर्ष अगस्त में माउंट शार्प के निकट उतरा था। यह मंगल ग्रह पर आवास के योग्य वातावरण का पता लगाने के उद्देश्य से वहा गया था। दिसंबर में क्यूरियोसिटी को मंगल पर चिकनी मिट्टी, जल और कार्बनिक पदार्थ की मौजूदगी के संकेत मिले थे। हालाकि इस नए शोध के सह लेखक केविन लेविस का कहना है कि इस बात के संकेत मिले हैं किवाशिगटन, प्रेट्र : वैानिक अब तक मानते रहे हैं कि मंगल ग्रह पर मौजूद 5.6 किलोमीटर ऊंचे टीले का निर्माण झील की गाद से हुआ है। लेकिन एक नए विश्लेषण के मुताबिक ऐसा संभव है कि इस टीले का निर्माण लाल ग्रह के धूल धूसरित वातावरण के कारण हुआ हो। इससे इस ग्रह पर जीवन की संभावना तलाशने के प्रयास को झटका लग सकता है। यदि इस शोध के परिणाम सही साबित हुए तो टीले में जल के विशाल भंडार होने की उम्मीदों को भी झटका लगेगा। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं का कहना है कि हवा द्वारा धूल और रेत को ढोकर 154 किलोमीटर चौड़े क्रेटर में लाने से 'माउंट शार्प' नाम के इस टीले का निर्माण हुआ है। यह उस प्रचलित सिद्धात के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि माउंट शार्प का निर्माण झील में जमा गाद से हुआ है। इसका यह मतलब हो सकता है कि मंगल पर पूर्व में पृथ्वी जैसी जलवायु होने के बारे में अधिकाश वैानिक जितनी उम्मीद करते हैं, उससे कम ही प्रमाण मौजूद हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का रोवर क्यूरियोसिटी पिछले वर्ष अगस्त में माउंट शार्प के निकट उतरा था। यह मंगल ग्रह पर आवास के योग्य वातावरण का पता लगाने के उद्देश्य से वहा गया था। दिसंबर में क्यूरियोसिटी को मंगल पर चिकनी मिट्टी, जल और कार्बनिक पदार्थ की मौजूदगी के संकेत मिले थे।
वाशिगटन। वैज्ञानिक अब तक मानते रहे हैं कि मंगल ग्रह पर मौजूद 5.6 किलोमीटर ऊंचे टीले का निर्माण झील की गाद से हुआ है। लेकिन एक नए विश्लेषण के मुताबिक ऐसा संभव है कि इस टीले कार्र् निर्माण लाल ग्रह के धूल धूसरित वातावरण के कारण हुआ हो। इससे इस ग्रह पर जीवन की संभावना तलाशने के प्रयास को झटका लग सकता है। यदि इस शोध के परिणाम सही साबित हुए तो टीले में जल के विशाल भंडार होने की उम्मीदों को भी झटका लगेगा। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं का कहना है कि हवा द्वारा धूल और रेत को ढोकर 154 किलोमीटर चौड़े क्त्रेटर में लाने से 'माउंट शार्प' नाम के इस टीले का निर्माण हुआ है। यह उस प्रचलित सिद्धात के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि माउंट शार्प का निर्माण झील में जमा गाद से हुआ है। इसका यह मतलब हो सकता है कि मंगल पर पूर्व में पृथ्वी जैसी जलवायु होने के बारे में अधिकाश वैानिक जितनी उम्मीद करते हैं, उससे कम ही प्रमाण मौजूद हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का रोवर क्यूरियोसिटी पिछले वर्ष अगस्त में माउंट शार्प के निकट उतरा था। यह मंगल ग्रह पर आवास के योग्य वातावरण का पता लगाने के उद्देश्य से वहा गया था। दिसंबर में क्यूरियोसिटी को मंगल पर चिकनी मिट्टी, जल और कार्बनिक पदार्थ की मौजूदगी के संकेत मिले थे। हालाकि इस नए शोध के सह लेखक केविन लेविस का कहना है कि इस बात के संकेत मिले हैं किवाशिगटन, प्रेट्र : वैानिक अब तक मानते रहे हैं कि मंगल ग्रह पर मौजूद 5.6 किलोमीटर ऊंचे टीले का निर्माण झील की गाद से हुआ है। लेकिन एक नए विश्लेषण के मुताबिक ऐसा संभव है कि इस टीले का निर्माण लाल ग्रह के धूल धूसरित वातावरण के कारण हुआ हो। इससे इस ग्रह पर जीवन की संभावना तलाशने के प्रयास को झटका लग सकता है। यदि इस शोध के परिणाम सही साबित हुए तो टीले में जल के विशाल भंडार होने की उम्मीदों को भी झटका लगेगा। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं का कहना है कि हवा द्वारा धूल और रेत को ढोकर 154 किलोमीटर चौड़े क्रेटर में लाने से 'माउंट शार्प' नाम के इस टीले का निर्माण हुआ है। यह उस प्रचलित सिद्धात के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि माउंट शार्प का निर्माण झील में जमा गाद से हुआ है। इसका यह मतलब हो सकता है कि मंगल पर पूर्व में पृथ्वी जैसी जलवायु होने के बारे में अधिकाश वैानिक जितनी उम्मीद करते हैं, उससे कम ही प्रमाण मौजूद हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का रोवर क्यूरियोसिटी पिछले वर्ष अगस्त में माउंट शार्प के निकट उतरा था। यह मंगल ग्रह पर आवास के योग्य वातावरण का पता लगाने के उद्देश्य से वहा गया था। दिसंबर में क्यूरियोसिटी को मंगल पर चिकनी मिट्टी, जल और कार्बनिक पदार्थ की मौजूदगी के संकेत मिले थे।
तितली की नई प्रजाति
Updated on: Fri, 17 May 2013 11:24 AM (IST)
तितलियों के रंगबिरंगे संसार में नए मेहमान का आगमन हुआ है। तितली प्रजाति का यह नया मेहमान देखने में अपने कुनबे के अन्य सदस्यों जैसा ही है, मगर शारीरिक अध्ययन में पता चला कि दुनियाभर में पहले इसे कभी नहीं देखा गया। इस तितली को खोजने का श्रेय जाता है देहरादून स्थित भारतीय प्राणी विान सर्वेक्षण को। तितली का नाम 'यापथिमा राजोई' रखा गया है, यह नाम पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलोजी डिपाटर्मंट के पूर्व प्रमुख डॉ. एचएस रोजू के नाम पर रखा गया। अब विश्व में तितली प्रजातियों की संख्या 17 हजार 281 हो गई है। नई प्रजाति की खोज करने वाले जेडएसआइ के वैानिक डा. नरेंद्र शर्मा के मुताबिक एक ताजा सर्वेक्षण में यापथिमा राजोई की खोज उलर प्रदेश के पीलीभीत स्थित दुधवा नेशनल पार्क के तराई क्षेत्र में की गई। इस प्रजाति की तितली विश्वभर में कहीं पर भी रिपोर्ट नहीं की गई है। तितली के शारीरिक अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि हो चुकी है। जेडएसआइ के जर्नल में भी नई खोज को जगह दी गई है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यापथिमा बड़े क्षेत्र में विचरण करने वाली तितली है। जिससे यह परागण (फूलों को निषेचित कर फल व अन्न उपजाने की प्राकृतिक प्रक्त्रिया) में भी अधिक सक्त्रिय भागीदारी निभाएगी। अच्छी बात यह कि यह तितलिया पार्क क्षेत्र में बड़ी संख्या में हैं, लिहाजा इनके अस्तित्व को लेकर फिलहाल कोई खतरा भी नहीं। यह भी पता लगाया जाएगा कि यापथिमा राजोई किसी दूसरे क्षेत्र में भी पाई जाती है या नहीं।
विश्व में तितली प्रजातियों की संख्या 17280 से बढ़कर 17281 हो गई है।
भारत में तितलियों की 1643 प्रजातिया हैं। विश्व के मुकाबले यह संख्या 9.5 फीसद है।
तितलियों के रंगबिरंगे संसार में नए मेहमान का आगमन हुआ है। तितली प्रजाति का यह नया मेहमान देखने में अपने कुनबे के अन्य सदस्यों जैसा ही है, मगर शारीरिक अध्ययन में पता चला कि दुनियाभर में पहले इसे कभी नहीं देखा गया। इस तितली को खोजने का श्रेय जाता है देहरादून स्थित भारतीय प्राणी विान सर्वेक्षण को। तितली का नाम 'यापथिमा राजोई' रखा गया है, यह नाम पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलोजी डिपाटर्मंट के पूर्व प्रमुख डॉ. एचएस रोजू के नाम पर रखा गया। अब विश्व में तितली प्रजातियों की संख्या 17 हजार 281 हो गई है। नई प्रजाति की खोज करने वाले जेडएसआइ के वैानिक डा. नरेंद्र शर्मा के मुताबिक एक ताजा सर्वेक्षण में यापथिमा राजोई की खोज उलर प्रदेश के पीलीभीत स्थित दुधवा नेशनल पार्क के तराई क्षेत्र में की गई। इस प्रजाति की तितली विश्वभर में कहीं पर भी रिपोर्ट नहीं की गई है। तितली के शारीरिक अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि हो चुकी है। जेडएसआइ के जर्नल में भी नई खोज को जगह दी गई है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यापथिमा बड़े क्षेत्र में विचरण करने वाली तितली है। जिससे यह परागण (फूलों को निषेचित कर फल व अन्न उपजाने की प्राकृतिक प्रक्त्रिया) में भी अधिक सक्त्रिय भागीदारी निभाएगी। अच्छी बात यह कि यह तितलिया पार्क क्षेत्र में बड़ी संख्या में हैं, लिहाजा इनके अस्तित्व को लेकर फिलहाल कोई खतरा भी नहीं। यह भी पता लगाया जाएगा कि यापथिमा राजोई किसी दूसरे क्षेत्र में भी पाई जाती है या नहीं।
विश्व में तितली प्रजातियों की संख्या 17280 से बढ़कर 17281 हो गई है।
भारत में तितलियों की 1643 प्रजातिया हैं। विश्व के मुकाबले यह संख्या 9.5 फीसद है।
अमेरिका में मिली हरी आख वाली तितली
मार्च में हुआ था चाद पर सबसे बड़ा विस्फोट
Updated on: Tue, 21 May 2013 11:36 AM (IST)
वाशिटगन। नासा ने कहा है कि गत 17 मार्च को चाद की सतह से कोई बाहरी पदार्थ टकराया था। इससे उसकी सतह पर अब तक का सबसे बड़ा विस्फोट होते देखा गया था। उसे धरती से बगैर दूरबीन के भी देखा जा सकता था। नासा के मेटियोरॉयड इनवायरन्मेंट कार्यालय के बिल कुक ने कहा कि एक छोटा शिलाखंड टकराया था। विस्फोट के बाद जो चमक पैदा हुई अब तक हम लोगों ने जो चमक देखी थी उससे दस गुना अधिक थी। कोई भी व्यक्ति तब चाद को देखता तो उस विस्फोट का असर देख सकता था। उसके लिए किसी दूरबीन की जरूरत नहीं थी। जहा वह टक्कर हुई थी वहा करीब एक सेकंड तक तो किसी तारे से चार गुना चमक थी। नासा के अनुसार, मार्शल स्पेस फ्लाइंग सेंटर के एक विश्लेषक रॉन सग्स कहते हैं कि उन्होंने सबसे पहले एक डिजिटल वीडियो रिकार्ड करते उसके असर की ओर ध्यान दिया। वह इतना चमकीला था कि लगा कि वह उछल कर उनके ऊपर आ गिरा। वह करीब 88 किलो का था और उसकी चौड़ाई 30 से 40 सेंटीमीटर थी। वह 90 हजार 123 किलोमीटर प्रतिघटे की रफ्तार से टकराया था। इसकी वजह से पाच टन टीएनटी विस्फोटक के बराबर विस्फोट था। चंद्रमा पर उल्कापात का नासा पिछले आठ सालों से अध्ययन कर रहा है। ये अब तक का सबसे विशाल उल्कापिंड था जिसकी चमक पृथ्वी तक भी देखी गई। पिछले आठ सालों में चंद्रमा पर 300 दफा उल्कापात हो चुके हैं। लेकिन ये धमाका पिछले धमाकों से दस गुना अधिक था।
वाशिटगन। नासा ने कहा है कि गत 17 मार्च को चाद की सतह से कोई बाहरी पदार्थ टकराया था। इससे उसकी सतह पर अब तक का सबसे बड़ा विस्फोट होते देखा गया था। उसे धरती से बगैर दूरबीन के भी देखा जा सकता था। नासा के मेटियोरॉयड इनवायरन्मेंट कार्यालय के बिल कुक ने कहा कि एक छोटा शिलाखंड टकराया था। विस्फोट के बाद जो चमक पैदा हुई अब तक हम लोगों ने जो चमक देखी थी उससे दस गुना अधिक थी। कोई भी व्यक्ति तब चाद को देखता तो उस विस्फोट का असर देख सकता था। उसके लिए किसी दूरबीन की जरूरत नहीं थी। जहा वह टक्कर हुई थी वहा करीब एक सेकंड तक तो किसी तारे से चार गुना चमक थी। नासा के अनुसार, मार्शल स्पेस फ्लाइंग सेंटर के एक विश्लेषक रॉन सग्स कहते हैं कि उन्होंने सबसे पहले एक डिजिटल वीडियो रिकार्ड करते उसके असर की ओर ध्यान दिया। वह इतना चमकीला था कि लगा कि वह उछल कर उनके ऊपर आ गिरा। वह करीब 88 किलो का था और उसकी चौड़ाई 30 से 40 सेंटीमीटर थी। वह 90 हजार 123 किलोमीटर प्रतिघटे की रफ्तार से टकराया था। इसकी वजह से पाच टन टीएनटी विस्फोटक के बराबर विस्फोट था। चंद्रमा पर उल्कापात का नासा पिछले आठ सालों से अध्ययन कर रहा है। ये अब तक का सबसे विशाल उल्कापिंड था जिसकी चमक पृथ्वी तक भी देखी गई। पिछले आठ सालों में चंद्रमा पर 300 दफा उल्कापात हो चुके हैं। लेकिन ये धमाका पिछले धमाकों से दस गुना अधिक था।
हब्बल दूरबीन ने खोजी नई आकाशगंगा
Updated on: Tue, 27 Nov 2012 11:18 AM (IST)
वाशिंगटन। खगोल विज्ञानियों ने हब्बल दूरबीन के जरिये एक नई आकाशगंगा खोजने का दावा किया है। उनके मुताबिक यह घुमावदार आकाशगंगा गैस और धूल से भरी है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एक बयान में कहा है कि ईएसओ 499-जी37 आकाशगंगा हाइड्रा तारामंडल की दक्षिणी सीमा पर स्थित है। इसमें अन्य आकाशगंगाओं की तरह ऐसे क्षेत्र मौजूद हैं जहां लगातार नए तारों का निर्माण होता रहता है।
हब्बल दूरबीन ने खोजी नई आकाशगंगा
Updated on: Tue, 27 Nov 2012 11:18 AM (IST)
वाशिंगटन। खगोल विज्ञानियों ने हब्बल दूरबीन के जरिये एक नई आकाशगंगा खोजने का दावा किया है। उनके मुताबिक यह घुमावदार आकाशगंगा गैस और धूल से भरी है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एक बयान में कहा है कि ईएसओ 499-जी37 आकाशगंगा हाइड्रा तारामंडल की दक्षिणी सीमा पर स्थित है। इसमें अन्य आकाशगंगाओं की तरह ऐसे क्षेत्र मौजूद हैं जहां लगातार नए तारों का निर्माण होता रहता है।
सबसे गर्म ग्रह बुध पर भी पानी
Updated on: Sat, 01 Dec 2012 10:39 AM (IST)
वाशिगटन। सूरज के सबसे नजदीक और सबसे गर्म ग्रह बुध पर नासा के वैज्ञानिकों ने पानी को खोज निकाला है। जमी हुई अवस्था में यह पानी बुध ग्रह के ध्रुवों पर मौजूद है। इस पानी में कुछ वाष्पशील पदार्थ भी मौजूद हैं।
नासा का मैसेंजर नाम का अंतरिक्ष यान बुध ग्रह की परिस्थितियों का अध्ययन कर रहा है। यह यान पिछले साल मार्च में बुध ग्रह पर पहुंचा था। नासा की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि वैज्ञानिकों ने पहली बार अनुभव किया कि किस तरह से सौरमंडल में पृथ्वी समेत लगभग सभी ग्रहों पर किसी न किसी रूप में अपना पानी और जीवन के पनपने के लिए कुछ रसायन मौजूद हैं।
जोंस होपकिंस यूनिवर्सिटी के एपलाइड फिजिक्स लेबोरेटरी (एपीएल) में मैसेंजर के वैज्ञानिक डेविड लारेंस ने कहा, नए आकड़ों में पता चला है कि बुध के ध्रुवों पर मौजूद पानी अमेरिका की राजधानी वाशिगटन जितने बड़े क्षेत्र में फैला है और इसकी गहराई दो मील तक हो सकती है।
सूरज से नजदीकी को देखते हुए बुध पर बर्फ या पानी की मौजूदगी हैरान कर देने वाली है। हालाकि बुध का अपने घूर्णन अक्ष पर झुकाव एक डिग्री है, जिससे यहा ध्रुवों पर कुछ ऐसा क्षेत्र है, जहा सूरज की रोशनी कभी नहीं पड़ती। मैसेंजर के नए विश्लेषण से इस विचार को बल मिला है कि पानी बुध के उत्तरी ध्रुव पर मौजूद प्रमुख घटक है। गुरुवार को यह खोज साइंस एक्सप्रेस में प्रकाशित हुई है।